कांग्रेस के कई धुरंधरों को धूल चटा चुके हैं गहलोत, पायलट से पहले इन दिग्गजों पर भी पड़े हैं भारी

राजस्थान में सत्ता संघर्ष और राजनीतिक घमासान अभी भी जारी है। इन सबके बीच अब प्रदेश के मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अशोक गहलोत ने सामने से आकर मुकाबला करने का ठान लिया है। राजस्थान में कांग्रेस के कद्दावर नेता और राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी गहलोत ने एक बार फिर से कांग्रेस की नैया को पार लगाने का मन बना लिया है। यही कारण है कि वे प्रधानमंत्री से लेकर राज्यपाल तक से भिड़ने में कोताही नहीं बरत रहे हैं। फिलहाल गहलोत लगातार सदन में फ्लोर टेस्ट की मांग कर बहुमत साबित करने पर अड़े हुए हैं

हालांकि यह पहला मौका नहीं है जब गहलोत की कुर्सी पर खतरा मंडराया है, इससे पहले भी कांग्रेस के कई नेता उन्हें चुनौती दे चुके हैं और हर बार गहलोत ने ही बाजी मारी है। आइए एक बार नजर डालते हैं राजस्थान में गहलोत की राजनीतिक यात्रा पर।

परसराम की जगह गहलोत बनाए गए मुख्यमंत्री
राजस्थान की राजनीति में गहलोत ने सबसे पहले कांग्रेस के कद्दावर नेता परसराम मदेरणा को पटखनी दी थी। एक समय मदेरणा पार्टी और प्रदेश के काफी बड़े नाम के रूप में पहचाने जाते थे। 1998 में कांग्रेस के उस वक्त के प्रदेश अध्यक्ष रहे मदेरणा की अगुवाई में कांग्रेस ने राजस्थान में चुनाव लड़ा, इसमें कांग्रेस की बड़ी जीत हुई। हालांकि जब मुख्यमंत्री बनने की बारी आई तो जोधपुर के उस वक्त के सांसद रहे अशोक गहलोत को कांग्रेस आलाकमान ने सत्ता सौंप दी। कहते है कि गहलोत के सोनिया गांधी से अच्छे और मजबूत रिश्ते हैं।

नवल किशोर पर भी भारी पड़े गहलोत
2004 से 2009 तक गुजरात के राज्यपाल रहे कांग्रेस नेता नवल किशोर शर्मा जयपुर से थे और उन्होंने लंबे समय तक राजनीति की थी। उनका भी नाम पार्टी और प्रदेश के बड़े नेताओं में शुमार था, यही कारण था कि उन्हें भी मुख्यमंत्री के दावेदारों में गिना जाता था। उन्होंने कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और स्पीकर से लेकर कई अहम पदों पर अपनी भूमिका निभाई थी, हालांकि मुख्यमंत्री गहलोत के रहते वे भी कभी प्रदेश के मुखिया नहीं बन पाए।

सीपी जोशी को स्पीकर बनाकर दावेदारी खत्म की
कांग्रेस के एक और बड़े और प्रभावी नेताओं में सीपी जोशी का नाम भी शामिल है। राजसमंद जिले के नाथद्वारा सीट से कांग्रेस के मजबूत दावेदार जोशी भी गहलोत के प्रतिद्वंदी रहे हैं और मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए जोर आजमाइश कर चुके हैं। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में चार बार महासचिव का पद संभालने वाले जोशी भी गहलोत के आगे नहीं टीक पाए। कई कोशिशों के बावजूद आखिरकार जनवरी 2019 में उन्हें स्पीकर के पद से ही संतुष्ट होना पड़ा।

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